चीख
रात हो जाती है जब, घनी स्याह
तूफ़ान समुन्दर में उठते हैं अथाह
उस पहर जब
जिन्दा भी मुर्दों की श्रेणी में आते हैं
मरहम से सपने नींद सजाते हैं
महसूस होता है एक साया
जिस्म पर हाथ फेरता
चूड़ियाँ तब भी टूटती हैं
दर्द की वो भी पराकाष्ठा है
मगर चीख जिस्म से
बाहर नही निकलती
क्योंकि -
उसके पास "सर्टिफिकेट" है
- पारुल 'पंखुरी'
Parul 'Pankhuri'
Email : pankhuri1978@gmail.com
Parul 'Pankhuri'
Email : pankhuri1978@gmail.com

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इस महीने
'पाबंदियाँ'
बालकृष्ण मिश्रा


होंठ पर पाबन्दियाँ हैं
गुनगुनाने की।

निर्जनों में जब पपीहा
पी बुलाता है।
तब तुम्हारा स्वर अचानक
उभर आता है।

अधर पर पाबन्दियाँ हैं
गीत गाने की। ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने
'थकी दुपहरी में पीपल पर'
गिरिजाकुमार माथुर


थकी दुपहरी में पीपल पर,
काग बोलता शून्य स्वरों में,
फूल आख़िरी ये बसन्त के
गिरे ग्रीष्म के ऊष्म करों में

धीवर का सूना स्वर उठता
तपी रेत के दूर तटों पर ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 8 जून को

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