वहीं से
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।
देश के बंजर समय के
बाँझपन में
याकि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में

या अगर हैं
परिस्थितियों की तलहटी में
तो वहीं से बादलों के रूप में
ऊपर उठेंगे।
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।

यह हमारी नियति है
चलना पड़ेगा
रात में दीपक
दिवस में सूर्य बन जलना पड़ेगा।

जो लड़ाई पूर्वजों ने छोड़ दी थी
हम लड़ेंगे
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।
- ओम प्रभाकर
Poet's Address: 7, Quila Road, Bhind (M.P)
Ref: Naye Purane, 1999

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इस महीने - काव्यालय की विशेष प्रस्तुति
#5 बिना मेरे कोई भी अर्थ कैसे निकल पाता तुम्हारे इतिहास का
#4 युद्ध के बाद कृष्ण पर क्या बीत रही होगी - वह सपने में देखती है
#3 तुम्हारे महान बनने में - क्या मेरा कुछ टूट कर बिखर गया है कनु!
#2 कृष्ण द्वारका चले गए हैं - और उनकी प्रिया? उसका संसार?
#1 उस दिन कृष्ण अपनी प्रिया को कितनी देर वंशी से टेरते रहे -