वहीं से
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।
देश के बंजर समय के
बाँझपन में
याकि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में

या अगर हैं
परिस्थितियों की तलहटी में
तो वहीं से बादलों के रूप में
ऊपर उठेंगे।
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।

यह हमारी नियति है
चलना पड़ेगा
रात में दीपक
दिवस में सूर्य बन जलना पड़ेगा।

जो लड़ाई पूर्वजों ने छोड़ दी थी
हम लड़ेंगे
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।
- ओम प्रभाकर
Poet's Address: 7, Quila Road, Bhind (M.P)
Ref: Naye Purane, 1999

***
इस महीने
'जल कर दे'
वाणी मुरारका


ईश्वर मुझको जल कर दे
सीमित कर सागर कर दे

मोड़े तू जिस ओर मुझे
चल दूँ दे जी-जान तुझे

चट्टानों से ढल कर के
निर्मल निर्झर सा कर दे ...
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शुक्रवार 19 जनवरी को

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