व्यथा जी उठी
अचेत की धूल में गढ़ी,
जंग से मढ़ी,
बरसों पहले की व्यथा,
मौन थी, सुप्त थी।
अपने आपको लपेटे थी।
चेतन ने उसे गाड़ा था यहाँ,
सँभाल न पा रहा था, अपने यहाँ।
उस दिन किसी ने,
अनजाने में
उसे छू लिया,
तो वह कराह उठी,
कुलबुला उठी,
मृत व्यथा
फिर जीवित हो गयी थी।
चेतन ने भी
उसके जी उठने पर
कुछ अश्रु-बूँदें
बहायी थीं।
- गीता मल्होत्रा
Geeta Malhotra
Email: geetam.kavita@gmail.com
Geeta Malhotra
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काव्यालय की विशेष प्रस्तुति
इस महीने की कविता
किसी के सान्निध्य का ऐसा असर!
'तुम्हारे साथ रहकर'
सर्वेश्वरदयाल सकसेना


तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
कि दिशाएँ पास आ गयी हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन-सी बन गयी है ...
पूरी रचना यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने की कविता
दाम्पत्य जीवन में अहं के टकरार के बाद -
'पुनर्मिलन'
राजेश कुमार दूबे


फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ
इस बहाने दंभ के उस आवरण को भी हटा लूँ

दंश दे जो जिंदगी को वह कहानी हम भुला दें
आपसी मनभेद की अंतर्व्यथा को हम सुला दें
नेह के नवपुष्प का नव अंकुरण फिर से करा लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ ...
पूरी रचना यहाँ पढें...