उदासी खूबसूरत
अम्बुधि लहरों के शोर में
असीम शान्ति की अनुभूति लिए,
अपनी लालिमा के ज़ोर से
अम्बर के साथ – लाल सागर को किए,
विहगों के होड़ को
घर लौट जाने का संदेसा दिए,
दिनभर की भाग दौड़ को
संध्या में थक जाने के लिए
दूर क्षितिज के मोड़ पे
सूरज को डूब जाते देखा!

तब, तट पे बैठे
इस दृश्य को देखते
नम आँखें लिए
बाजुओं को आजानुओं से टेकते
इस व्याकुल मन में
एक विचार आया!
किंतु उस उलझन का,
परामर्श आज भी नही पाया!
की जब विदाई में एक दुल्हन रोती है,
जब बिन बरखा-दिन में धुप खोती है,
जब शाम अंधेरे में सोती है,
तब, क्या उदासी खुबसूरत नही होती है?
- दीपक कुमार
अम्बुधि : सागर । आजानु : घुटना
deepakkumar.13@gmail.com

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इस महीने
'सत्ताईस फरवरी: शहीद का ब्याह'
प्रदीप शुक्ला


बड़े दिनों की लालसा, बड़े दिनों की चाह।
लिख पायेगी लेखनी, क्या शहीद का ब्याह ?
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स्वर्ग लोक में सभा सजी थी, सब थे पद आसीन
मृत्यु प्रफुल्लित खड़ी हुई थी, यम थे पीठासीन।
बेटी की शादी निकट खड़ी माथे पर चिंता भारी
सत्ताईस फरवरी तिथि निश्चित पूर्ण नहीं तैयारी। ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने
'तोंद'
प्रदीप शुक्ला


कहते हैं सब लोग तोंद एक रोग बड़ा है
तोंद घटाएँ सभी चलन यह खूब चला है।
पर मानो यदि बात तोंद क्यों करनी कम है
सुख शान्ति सम्मान दायिनी तोंद में दम है।

औरों की क्या कहूं, मैं अपनी बात बताता
बचपन से ही रहा तोंद से सुखमय नाता। ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
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शुक्रवार 9 मार्च को

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