सृष्टि का सार
रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की मान्यतायें
मेरे अस्पष्ट भावों का विकार

तभी तो तब से अब तक
यद्यपि बहुत बार
एकत्रित किया रेखाओं को,
रचने भी चाहे सीमाओं से
मन के विस्तार

फिर भी कल्पना को आकृति ना मिली
ना कोई पर्याय, ना कोई नाम
बिछी है अब तक मेरे और कैनवस के बीच
एक अनवरत प्रतीक्षा...
जो ढूँढ रही है अपनी बोयी रिक्तताओं में
अपनी ही सृष्टि का सार॥
- अंशु जौहरी

प्रकाशित: 14 Nov 2011

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इस महीने
'पाबंदियाँ'
बालकृष्ण मिश्रा


होंठ पर पाबन्दियाँ हैं
गुनगुनाने की।

निर्जनों में जब पपीहा
पी बुलाता है।
तब तुम्हारा स्वर अचानक
उभर आता है।

अधर पर पाबन्दियाँ हैं
गीत गाने की। ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने
'थकी दुपहरी में पीपल पर'
गिरिजाकुमार माथुर


थकी दुपहरी में पीपल पर,
काग बोलता शून्य स्वरों में,
फूल आख़िरी ये बसन्त के
गिरे ग्रीष्म के ऊष्म करों में

धीवर का सूना स्वर उठता
तपी रेत के दूर तटों पर ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
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शुक्रवार 8 जून को

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