प्रवाह
बनकर नदी जब बहा करूंगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
अपनी आँखों से कहा करूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
हर कथा रचोगे एक सीमा तक
बनाओगे पात्र नचाओगे मुझे
मेरी कतार काटकर तुम
एक भीड़ का हिस्सा बनाओगे मुझे
मेरी उड़ान को व्यर्थ बता
हंसोगे मुझपर, टोकोगे मुझे
एक तस्वीर बता, दीवार पर चिपकाओगे मुझे।
पर जब ...
अपने ही जीवन से कुछ पल चुराकर
मैं चुपके से जी लूँ!
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
तुम्हे सोता देख,
मैं अपने सपने सी लूँ!
अपनी कविता के कान भरूंगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
जितना सको प्रयास कर लो इसे रोकने की,
इसके प्रवाह का अन्दाज़ा तो मुझे भी नहीं अभी!
- अजंता शर्मा
Ajanta Sharma
email: sharma_ajanta@yahoo.com
Ajanta Sharma
email: sharma_ajanta@yahoo.com

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इस महीने
'वहीं से'
ओम प्रभाकर


हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।
देश के बंजर समय के
बाँझपन में
याकि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने
'सोच में सीलन बहुत है'
सीमा अग्रवाल


सोच में सीलन बहुत है
सड़ रही है,
धूप तो दिखलाइये

कीच से लिपटे हुए है
तर्क सारे
आप पर, माला बनाकर
जापते हैं
...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने की अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 22 सितम्बर को

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