प्रवाह
बनकर नदी जब बहा करूंगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
अपनी आँखों से कहा करूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
हर कथा रचोगे एक सीमा तक
बनाओगे पात्र नचाओगे मुझे
मेरी कतार काटकर तुम
एक भीड़ का हिस्सा बनाओगे मुझे
मेरी उड़ान को व्यर्थ बता
हंसोगे मुझपर, टोकोगे मुझे
एक तस्वीर बता, दीवार पर चिपकाओगे मुझे।
पर जब ...
अपने ही जीवन से कुछ पल चुराकर
मैं चुपके से जी लूँ!
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
तुम्हे सोता देख,
मैं अपने सपने सी लूँ!
अपनी कविता के कान भरूंगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
जितना सको प्रयास कर लो इसे रोकने की,
इसके प्रवाह का अन्दाज़ा तो मुझे भी नहीं अभी!
- अजंता शर्मा
Ajanta Sharma
email: sharma_ajanta@yahoo.com
Ajanta Sharma
email: sharma_ajanta@yahoo.com

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इस महीने की कविता
'खिलौना'
शबनम शर्मा


मैंने छुआ,
सहलाया उन्हें
व एक खिलौने
को अंक में भरा
कि पीछे से कर्कष
आवाज़ ने मुझे
झंझोड़ा ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने की कविता
'ठुकरा दो या प्यार करो'
सुभद्रा कुमारी चौहान


देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं।
सेवा में बहुमुल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं॥

धूमधाम से साजबाज से वे मंदिर में आते हैं।
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं॥

मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी।
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी॥ ...
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