पाबंदियाँ
होंठ पर पाबन्दियाँ हैं
गुनगुनाने की।
               निर्जनों में जब पपीहा
               पी बुलाता है।
               तब तुम्हारा स्वर अचानक
               उभर आता है।
अधर पर पाबन्दियाँ हैं
गीत गाने की।
               चाँदनी का पर्वतों पर
               खेलना रुकना
               शीश सागर में झुका कर
               रूप को लखना।
दर्पणों को मनाही
छबियाँ सजाने की।
               ओस में भीगी नहाई
               दूब सी पलकें,
               श्रृंग से श्यामल मचलती
               धार सी अलकें।
शिल्प पर पाबन्दियाँ
आकार पाने की।
               केतकी सँग पवन के
               ठहरे हुए वे क्षण,
               देखते आकाश को
               भुजपाश में, लोचन।
बिजलियों को है मनाही
मुस्कुराने की।
               हवन करता मंत्र सा
               पढ़ता बदन चन्दन,
               यज्ञ की उठती शिखा सा
               दग्ध पावन मन।
प्राण पर पाबन्दियाँ
समिधा चढाने की।
- बालकृष्ण मिश्रा
Poet's Address: Hospital Chowraha, Raibareili-229001
Ref: Naye Purane, 1999
Hospital Colony Mohangunj, Tiloi
Raibareili (U.P.) - 229 309

***
इस महीने
'प्रेम गाथा'
विनोद तिवारी


एक था काले मुँह का बंदर
वह बंदर था बड़ा सिकंदर।

उसकी दोस्त थी एक छुछुंदर
वह थी चांद सरीखी सुंदर। ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने
'जुगलबन्दी'
रति सक्सेना


जब तंत्रियों पर फिसलती छुअन
नाभि पर नाचती मिज़राब से
अभिमंत्रित कर देती सितार को
भीतर का समूचा रीतापन
भर उठता है। ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने
'गहरा आँगन'
वाणी मुरारका


इस पल का यह गहरा आँगन
इसमें तू स्पन्दित है साजन।
नयनालोकित स्मृतियों से हैं
मन भरपूर प्रीत से पावन।स ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 11 मई को

सूचना पाने के लिए
ईमेल दर्ज़ करें
संग्रह से कोई भी कविता | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेखहमारा परिचय | सम्पर्क करें

a  MANASKRITI  website