लो वही हुआ
लो वही हुआ जिसका था डर,
ना रही नदी, ना रही लहर।

      सूरज की किरन दहाड़ गई,
      गरमी हर देह उघाड़ गई,
      उठ गया बवंडर, धूल हवा में -
      अपना झंडा गाड़ गई,
गौरइया हाँफ रही डर कर,
ना रही नदी, ना रही लहर।

      हर ओर उमस के चर्चे हैं,
      बिजली पंखों के खर्चे हैं,
      बूढ़े महुए के हाथों से,
      उड़ रहे हवा में पर्चे हैं,
"चलना साथी लू से बच कर".
ना रही नदी, ना रही लहर।

      संकल्प हिमालय सा गलता,
      सारा दिन भट्ठी सा जलता,
      मन भरे हुए, सब डरे हुए,
      किस की हिम्मत, बाहर हिलता,
है खड़ा सूर्य सर के ऊपर,
ना रही नदी ना रही लहर।

      बोझिल रातों के मध्य पहर,
      छपरी से चन्द्रकिरण छनकर,
      लिख रही नया नारा कोई,
      इन तपी हुई दीवारों पर,
क्या बाँचूँ सब थोथे आखर,
ना रही नदी ना रही लहर।
- दिनेश सिंह
Ref: Naya Prateek, October,1976

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इस महीने
'सत्ताईस फरवरी: शहीद का ब्याह'
प्रदीप शुक्ला


बड़े दिनों की लालसा, बड़े दिनों की चाह।
लिख पायेगी लेखनी, क्या शहीद का ब्याह ?
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स्वर्ग लोक में सभा सजी थी, सब थे पद आसीन
मृत्यु प्रफुल्लित खड़ी हुई थी, यम थे पीठासीन।
बेटी की शादी निकट खड़ी माथे पर चिंता भारी
सत्ताईस फरवरी तिथि निश्चित पूर्ण नहीं तैयारी। ...
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इस महीने
'तोंद'
प्रदीप शुक्ला


कहते हैं सब लोग तोंद एक रोग बड़ा है
तोंद घटाएँ सभी चलन यह खूब चला है।
पर मानो यदि बात तोंद क्यों करनी कम है
सुख शान्ति सम्मान दायिनी तोंद में दम है।

औरों की क्या कहूं, मैं अपनी बात बताता
बचपन से ही रहा तोंद से सुखमय नाता। ...
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शुक्रवार 9 मार्च को

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