फसाना
रहो अपने दिल में
उड़ो आसमां तक
ज़मीं से आसमां तक
तेरा फसाना होगा

न जाने क्यूँ
न उड़ता हूँ मैं
न रहता हूँ दिल में
फिर भी
हसरत है कि
फसाना बन जाऊँ

फसाने बहुत हुए
सदियों से
कुछ तुफां
से आये
और बिखर गये
कुछ हलचलें
दिखातीं हैं
सतहों पर
न जाने किस
दबे तुफां की
तसवीर हैं ये

दिलों, आसमां औ जमीं
की तारीख
इन फसानों
में सिमटी
बिखरी है

कुछ बनने की
ख्वाहिश
कुछ गढ़ने
की ज़रूरत

मैं एक फसाना हूँ
एक कशिश
एक धड़कन
हूँ दिल की

जिसकी आवाज
सदियों से
चंद फसानों में
निरंतर
कल कल
नदी के नाद
सी
थिरकती आयी
है।
- रणजीत कुमार मुरारका
Ranjeet Murarka
Email : ranjeetmurarka@gmail.com
Ranjeet Murarka
Email : ranjeetmurarka@gmail.com

***
रणजीत कुमार मुरारका
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 फसाना
 कल
 रिश्ते तूफां से
 उद्गार

इस महीने - काव्यालय की विशेष प्रस्तुति
#5 बिना मेरे कोई भी अर्थ कैसे निकल पाता तुम्हारे इतिहास का
#4 युद्ध के बाद कृष्ण पर क्या बीत रही होगी - वह सपने में देखती है
#3 तुम्हारे महान बनने में - क्या मेरा कुछ टूट कर बिखर गया है कनु!
#2 कृष्ण द्वारका चले गए हैं - और उनकी प्रिया? उसका संसार?
#1 उस दिन कृष्ण अपनी प्रिया को कितनी देर वंशी से टेरते रहे -