एक बौनी बूँद
एक बौनी बूँद ने
मेहराब से लटक
अपना कद
लंबा करना चाहा

बाकी बूँदें भी
देखा देखी
लंबा होने की
होड़ में
धक्का मुक्की
लगा लटकीं

क्षण भर के लिए
लंबी हुई
फिर गिरीं
और आ मिलीं
अन्य बूँदों में
पानी पानी होती हुई
नादानी पर अपनी।
- दिव्या माथुर
Divya Mathur
email: divyamathur@aol.com
Divya Mathur
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'समय की शिला पर'
शम्भुनाथ सिंह


समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाये, किसी ने मिटाये।

किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी
किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूंद पानी
इसी में गये बीत दिन ज़िन्दगी के
गयी घुल जवानी, गयी मिट निशानी।

विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने
धरा ने उठाये, गगन ने गिराये।
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शुक्रवार 22 दिसम्बर को

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