आज नदी बिलकुल उदास थी
आज नदी बिलकुल उदास थी।
सोयी थी अपने पानी में,
उसके दर्पण पर -
बादल का वस्त्र पड़ा था।
मैंने उसे नहीं जगाया,
दबे पाँव घर वापस आया।
- केदारनाथ अग्रवाल
काव्यपाठ: वाणी मुरारका

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केदारनाथ अग्रवाल
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 आज नदी बिलकुल उदास थी
 बसंती हवा
इस महीने
'जल कर दे'
वाणी मुरारका


ईश्वर मुझको जल कर दे
सीमित कर सागर कर दे

मोड़े तू जिस ओर मुझे
चल दूँ दे जी-जान तुझे

चट्टानों से ढल कर के
निर्मल निर्झर सा कर दे ...
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शुक्रवार 19 जनवरी को

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